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अब्राहम समझौते में नया मोड़: कजाखस्तान की दावेदारी और ट्रंप का दबाव
मध्य पूर्व की भू-राजनीतिक पहेली में एक और टुकड़ा जुड़ा है। अब्राहम समझौते, जो कि सिर्फ़ एक कागजी संधि नहीं बल्कि अरब दुनिया और इजरायल के बीच संबंधों को सामान्य बनाने का एक व्यापक ढांचा है, अब नए मोड़ पर हैं। हालिया रिपोर्ट्स और विश्लेषणों के अनुसार, कजाखस्तान ने इस समझौते में शामिल होने की संभावना जताई है, जिससे क्षेत्रीय गतिशीलता में बदलाव आने की उम्मीद है।
लेकिन यही बात दूसरी ओर तूफान बुढ़ा रही है। डोनाल्ड ट्रंप जैसे प्रभावशाली नेताओं द्वारा अन्य मुस्लिम देशों पर दबाव बढ़ाया जा रहा है, जबकि पाकिस्तान और सऊदी अरब ने स्पष्ट शब्दों में इनकार कर दिया है। यह केवल राजनयिक खेल नहीं, बल्कि पूरे मध्य पूर्व के भविष्य को लेकर एक महत्वपूर्ण लड़ाई है।
अब्राहम समझौते क्या हैं? एक संक्षिप्त परिचय
आसान शब्दों में कहें तो, अब्राहम समझौते कोई एक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि कई समझौतों की एक श्रृंखला है। इसका उद्देश्य उन अरब और मुस्लिम देशों को इजरायल के साथ अपने संबंध स्थापित करने के लिए एक सुरक्षित और लाभदायक मार्ग प्रदान करना है। पहले ये देश इजरायल को मान्यता देने से कतराते थे, लेकिन अब वे व्यापार, पर्यटन, सीधी हवाई उड़ानें और सुरक्षा सहयोग जैसे क्षेत्रों में सहयोग कर सकते हैं।
इस समझौते का नाम 'अब्राहम' (हजरत इब्राहिम) पर रखा गया है, जिन्हें ईसाई, यहूदी और मुस्लिम तीनों धर्मों में सम्मानित पैगंबर माना जाता है। इसका तात्पर्य था कि तीन भीमंत धर्मों के बीच शांति और भाईचारे की नींव रखी जाए। हालाँकि, वास्तविकता थोड़ी जटिल है। यह मुख्य रूप से एक भू-राजनीतिक रणनीति है जो मध्य पूर्व में स्थिरता लाने और ईरान जैसे प्रतिद्वंद्वियों को घेरने के लिए डिज़ाइन की गई है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: कैसे शुरू हुआ यह सफर?
इस कहानी की शुरुआत 13 अगस्त 2020 को हुई, जब इजरायल, संयुक्त राज्य अमेरिका और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने एक संयुक्त बयान जारी किया। इसके ठीक बाद, 15 सितंबर 2020 को वॉशिंगटन डी.सी. में एक ऐतिहासिक समारोह आयोजित किया गया। इस दिन बेंजामिन नेतन्याहू (इजरायल के प्रधानमंत्री), अब्दुल्ला बिन जायद अल नाहयान (UAE के विदेश मंत्री) और अब्दुल्लातीफ बिन राशिद अल ज़ायानी (बहरीन के विदेश मंत्री) ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए।
यह 1994 में जॉर्डन और इजरायल के बीच शांति संधि के बाद किसी अरब देश और इजरायल के बीच संबंधों के सामान्यीकरण का पहला बड़ा कदम था। याद रखें, मिस्र ने 1979 में ही इजरायल के साथ शांति समझौता कर लिया था, लेकिन अब्राहम समझौतों ने इस प्रक्रिया को एक नई गति दी। मार्च 2021 में UAE के पहले राजदूत इजरायल पहुंचे, जो इस समझौते के व्यावहारिक कार्यान्वयन की एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर था।
कजाखस्तान की प्रवेश और पाकिस्तान पर दबाव
हाल ही में हुए एक हिंदी यूट्यूब कार्यक्रम "दुनिया में चर्चा..." में एक चौंकाने वाला दावा किया गया कि नवंबर 2025 में कजाखस्तान ने अब्राहम समझौतों में शामिल होने का निर्णय लिया है। यदि यह सत्य साबित होता है, तो यह मध्य एशिया के इस मुस्लिम बहुल देश के लिए एक बड़ा राजनयिक बदलाव होगा। वर्तमान में इस समझौते में UAE, बहरीन, इजरायल, सूडान और मोरक्को शामिल हैं।
लेकिन इस खबर का सबसे बड़ा असर पाकिस्तान पर पड़ सकता है। कार्यक्रम में यह सवाल उठाया गया कि क्या पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनिर के सामने एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है? जब एक नया मुस्लिम देश इस समझौते में शामिल होता है, तो पाकिस्तान की बाहरी नीति पर दबाव बढ़ता है। पाकिस्तान ने हमेशा फिलिस्तीन के मुद्दे को अपनी विदेश नीति का केंद्र बिंदु रखा है, इसलिए ऐसे समझौतों में शामिल होना उसके लिए राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण है।
डोनाल्ड ट्रंप की भूमिका और सऊदी अरब का रुख
डोनाल्ड ट्रंप अब्राहम समझौतों के प्रमुख प्रवक्ता रहे हैं। उन्होंने हाल ही में अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर एक पोस्ट के माध्यम से सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र और जॉर्डन से अपील की है कि वे ईरान के साथ संघर्ष समाप्त होने के बाद इस समझौते में शामिल हों। ट्रंप का तर्क है कि यदि ईरान भी इसमें शामिल होता है, तो यह "सम्मान की बात" होगी।
हालाँकि, जवाब स्पष्ट है। नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब और पाकिस्तान दोनों ने अमेरिका के इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। ये दोनों देश अमेरिका के करीबी होते हुए भी, इजरायल को मान्यता देने के सवाल पर ट्रंप के दबाव में नहीं आए। यह दिखाता है कि मध्य पूर्व की राजनीति में स्थानीय वास्तविकताएं अमेरिकी दबाव से ऊपर हैं।
भारत के लिए क्या इसका मतलब है?
भारतीय परिप्रेक्ष्य से देखें तो अब्राहम समझौते भारत के लिए एक अनुकूल वातावरण बना रहे हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड_affairs_ (ICWA) के एक विश्लेषण के अनुसार, यह समझौता भारत को अरब देशों और इजरायल दोनों के साथ मजबूत संबंधों को बढ़ावा देने का अवसर देता है। भारत अब मध्य पूर्व में अपनी सैन्य और आर्थिक उपस्थिति को मजबूत कर सकता है।
इसके अलावा, यह समझौता ऊर्जा सुरक्षा और तकनीकी सहयोग के क्षेत्र में भारत के लिए नए द्वार खोलता है। हालाँकि, भारत को इसमें शामिल होने के बजाय, एक संतुलित नीति अपनाकर सभी पक्षों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
अब्राहम समझौतों में कौन से देश शामिल हैं?
मूल समझौते में इजरायल, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और बहरीन शामिल थे। बाद में सूडान और मोरक्को ने भी इसमें प्रवेश किया। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, कजाखस्तान भी इसमें शामिल होने वाला है। मिस्र और जॉर्डन पहले से ही अलग शांति संधियों के जरिए इजरायल के साथ संबंध रखते हैं।
क्या पाकिस्तान अब्राहम समझौतों में शामिल होगा?
फिलहाल, पाकिस्तान ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। पाकिस्तान फिलिस्तीन के मुद्दे पर अपनी स्थिति को अटल मानता है और इजरायल को मान्यता देने के खिलाफ है। डोनाल्ड ट्रंप के दबाव के बावजूद, पाकिस्तान ने स्पष्ट शब्दों में इनकार कर दिया है।
अब्राहम समझौतों का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इसका मुख्य उद्देश्य इजरायल और अरब देशों के बीच राजनयिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को सामान्य बनाना है। इसमें व्यापार, पर्यटन, सीधी हवाई उड़ानें और तकनीकी सहयोग जैसे क्षेत्र शामिल हैं। इसका लंबी अवधि का लक्ष्य मध्य पूर्व में स्थिरता लाना और ईरान के प्रभाव को कम करना है।
डोनाल्ड ट्रंप की इस समझौते में क्या भूमिका है?
डोनाल्ड ट्रंप इस समझौते के प्रमुख प्रवक्ता और मध्यस्थ रहे हैं। उन्होंने UAE और बहरीन को इजरायल के साथ संबंध स्थापित करने में मदद की थी। अब वे अन्य मुस्लिम देशों, विशेष रूप से सऊदी अरब और पाकिस्तान को इसमें शामिल करने के लिए दबाव बना रहे हैं।